असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन (NRC) का मुद्दा बढ़ता जा रहा है। NRC में 40 लाख लोगों का नाम ना होने पर उन लोगों बांग्लादेशी माना जा रहा हैं। वही इस मुद्दे को लेकर सभी विपक्षी पार्टियों में बहस शुरू हो गयी है। सरकार का तर्क है कि जिनके नाम शामिल नहीं किए गए हैं, वे घुसपैठिए हैं, उनके पास भारत की नागरिकता नहीं है। लेकिन इस रजिस्टर में कुछ ऐसे लोगों के नाम भी शामिल नहीं हैं, जिनके पुरखे भारत के निवासी रहे हैं। इनमें पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के रिश्तेदार भी शामिल हैं।
बताया जा रहा है कि उनके बड़े भाई एकरामुद्दीन अहमद के परिवार का नाम भी इस लिस्ट में शामिल नहीं है। फखरुद्दीन के भतीजे का कहना है कि वह अभी पूरे दस्तावेज़ पेश करेंगे। इतना ही नहीं असम के दक्षिण अभयपुरी से बीजेपी विधायक अनंत कुमार मालो का भी इस लिस्ट में नाम शामिल नहीं है। जिसके कारण वह भी चकित हैं। एक ओर लिस्ट में पूर्व राष्ट्रपति के परिवार का नाम नहीं है लेकिन राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के अंतिम ड्राफ्ट में यूनाइटेड लिब्रेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) के प्रमुख परेश बरूआ का नाम है।
हालांकि, उनकी पत्नी बॉबी भुयान और दो बेटों अरिंदम और आकाश के नाम गायब हैं। गौरतलब है की बांग्लादेश की तरफ से बयान आया है कि जिन लोगों का नाम NRC में नहीं है वो बांग्लादेशी नहीं हैं। बांग्लादेश के सूचना मंत्री एक न्यूज चैनल से बात करते हुए कहा है कि असम में कोई भी बांग्लादेशी नागरिक नहीं है। जो भी लोग पेरशानी पैदा कर रहे हैं वो भारतीय हैं। अवैध नागरिकों का मसला भारत का आंतरिक मसला है इससे बांग्लादेश का कोई लेना देना नहीं है।
इससे पहले ही राज्यसभा में इस मुद्दे पर हंगामा हुआ था तो वहीं बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह ने विपक्ष को निशाने पर लिया। पहले राज्यसभा और उसके बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अमित शाह ने विपक्ष से पूछा कि वह आखिर घुसपैठियों का साथ क्यों दे रहे हैं। अमित शाह ने कहा कि विपक्ष के सारे नेताओं को मैंने ध्यान से सुना, मैं पूरी बात सुन रहा था कि किसी ने ये नहीं बताया कि NRC क्यों आया। उन्होंने कहा कि असम में इसको लेकर बड़ा आंदोलन हुआ, कई लोगों ने अपनी जान गंवाई।
जिसके बाद 14 अगस्त, 1985 को राजीव गांधी ने असम समझौता किया। शाह ने कहा कि इस समझौते का मूल ही NRC था। इसमें कहा गया है कि अवैध घुसपैठियों को पहचान कर NRC बनाया जाएगा, ये आपके ही प्रधानमंत्री लाए थे, लेकिन आपमें इसे लागू करने की हिम्मत नहीं थी, हमारे में हिम्मत है और हम कर रहे हैं।
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