Monday, May 25, 2020

कोरोना काल में क्‍यों भिड़े UP और महाराष्‍ट्र?

लखनऊ/मुंबई एक ओर जहां कोरोना वायरस से देश जूझ रहा है, वहीं अलग-अलग मामलों को लेकर उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में राजनीतिक लड़ाई जारी है। पहले जहां लड़ाई दोनों राज्यों की सरकारों के बीच चल रही थी, वहीं अब यह राज्य वर्सेज राज्य की ओर बढ़ती दिख रही है। दरअसल दोनों राज्य सरकारों में राजनीतिक विवाद तो लंबे समय से रहा है, लेकिन प्रियंका गांधी द्वारा मजदूरों के लिए 1000 बसें उपलब्ध कराने के दावे और उसे सीएम योगी द्वारा स्वीकार किए जाने से इनकार के बाद विवाद लगातार बढ़ता गया। शिवसेना के मुखपत्र सामना में राज्यसभा सांसद संजय राउत ने संपादकीय लिखकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की तुलना हिटलर से की थी। उन्होंने लिखा कि यूपी में प्रवासियों के साथ हो रहे अत्याचार और जर्मनी में यहूदियों के साथ हुए अत्याचार एक समान हैं। वहीं इसके जवाब में उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ की ओर से लिखा गया, 'एक भूखा बच्चा ही अपनी मां को ढूंढता है। यदि महाराष्ट्र सरकार ने 'सौतेली मां' बन कर भी सहारा दिया होता तो महाराष्ट्र को गढ़ने वाले हमारे उत्तर प्रदेश के निवासियों को प्रदेश वापस न आना पड़ता।' फिर शुरू होगी मराठी-गैर मराठी की राजनीति? वहीं इसके बाद देश में यूपी के मजदूरों की घर वापसी और लॉकडाउन में हुई दुर्दशा को देखते हुए योगी सरकार ने घोषणा की कि किसी भी राज्य को अब यूपी के मजदूरों की सेवा लेने से पहले यूपी सरकार से इसकी इजाजत लेनी होगी। यूपी सरकार के इस निर्णय के बाद अब महाराष्ट्र में एक बार फिर मराठी और गैर मराठी राजनीति का दौर शुरू होता दिख रहा है। महाराष्ट्र में भी लेनी होगी इजाजत: राज ठाकरे महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के चीफ राज ठाकरे ने कहा है कि अगर योगी आदित्यनाथ ने ऐसा नियम बनाया है तो अब हम भी यह कहना चाहते हैं कि किसी भी मजदूर को महाराष्ट्र आने से पहले अब हमारी सरकार, पुलिस और प्रशासन से अनुमति लेना अनिवार्य होगा। ऐसा ना करने पर किसी को महाराष्ट्र में एंट्री नहीं मिलेगी। योगी आदित्यनाथ को इसका ध्यान रखना चाहिए। 'हमने सालों से रखा ख्याल' वहीं शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा कि यदि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री चाहते हैं कि राज्यों को उनके प्रदेश के लोगों को रोजगार देने के लिए उनकी अनुमति लेनी चाहिए तो उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रवासी मजदूर काम की तलाश में महाराष्ट्र आए थे। उन्होंने कहा, 'हमने उन्हें स्वीकार किया और उन्हें यहां काम करने दिया। हमने इन लोगों का ध्यान पिछले एक-डेढ़ महीने में ही नहीं रखा...बल्कि वे वर्षों से यहां काम करते रहे हैं। हम सब सौहार्द के साथ मिलकर रह रहे थे।'


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