लखनऊ जीत का सिलसिला बरकरार रखने और विधान परिषद में मौजूदगी मजबूत करने के लिए ने अगले साल खाली हो रहीं और कोटे की 11 सीटों पर गोटियां बिछानी शुरू कर दी हैं। बीजेपी पहली बार स्नातक और शिक्षक सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारेगी। इनकी सूची जल्द जारी होगी और पर्दे के पीछे इस रणनीति पर काम करेंगे उप मुख्यमंत्री डॉ़ दिनेश शर्मा। बीजेपी भले विधानसभा में प्रचंड बहुमत में हो, लेकिन विधान परिषद में उसे अक्सर असहज स्थिति का सामना करना पड़ता है। क्योंकि विधान परिषद में बीजेपी का संख्या बल कम है। ऐसे में उसकी नजर दलीय सीटों के अलावा अलग-अलग वर्ग की सीटों पर भी है। पहली नजर विधान परिषद में अगले साल खाली हो रहीं शिक्षक कोटे की सीटों पर है। सूत्र बताते हैं कि इसके लिए बीजेपी ने जो बिसात तैयार की है, उसके मुताबिक सहायता प्राप्त और वित्तविहीन शिक्षक संघों को तोड़ना है। इसके अलावा संबंधित जिला अध्यक्षों और जिला प्रभारियों को शिक्षकों और ज्यादा से ज्यादा स्नातकों को मतदाता सूची में जुड़वाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। लोगों की पसंद भी हो सकती है बीजेपी सूत्र बताते हैं कि बीजेपी के सिंबल पर होती जीतों को देखते हुए कई शिक्षक नेता भी अपना चुनाव बीजेपी के ही सिंबल पर लड़ना चाहते हैं। उनके बीजेपी का टिकट चाहने की एक बड़ी वजह यह भी है कि माध्यमिक शिक्षक और वित्तविहीन शिक्षक संघों के गुट में एक सीट पर कई दावेदार हैं। ऐसे में उनके पास बीजेपी के सिंबल और उसकी संगठनात्मक शक्ति का इस्तेमाल करते हुए चुनाव लड़ने का मौका है। 'यह एक बड़ी साजिश है' माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रदेशीय मंत्री डॉ. आरपी मिश्र ने बीजेपी के इस फैसले को विधान परिषद में शिक्षकों की आवाज को खत्म करने की साजिश बताया है। वह कहते हैं कि विधान परिषद में अलग-अलग वर्गों की आवाज उठे, इसलिए यह व्यवस्था की गई थी। यही वजह है कि राजनीतिक दल स्नातक और शिक्षक कोटे की सीटों पर उम्मीदवार नहीं उतारते थे। बीजेपी ने इस बार अपने प्रत्याशी उतारने का जो फैसला लिया है, वह निश्चित तौर पर अनुचित है। अगर इनके लोग चुने गए तो ये पार्टी और सरकार की नीतियों के तहत ही काम करेंगे और शिक्षकों की आवाज इसमें गुम हो जाएगी। हालांकि वह कहते हैं कि बीजेपी को इस प्रयास में सफलता नहीं मिलेगी, क्योंकि शिक्षक जानते हैं कि उनकी आवाज राजनीतिक दल नहीं उठा सकेंगे।
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