शुभम त्रिपाठी,दिल्ली मान लीजिए कि आप में चाय पीने जाएं और रेस्ट्रॉन्ट वाला आपसे खुद अपना कप लाने के लिए कहे! या हो सकता है कि बेवरेजेस के साथ वह आपको स्ट्रॉ ही न दे! हो सकता है कि स्ट्रॉ मिले, तो वह मेटल का हो। आप चाहें तो इस पर चौंक सकते हैं या नाराज भी हो सकते हैं। लेकिन खुद को फ्री बनाने के लिए कई रेस्तरां और फूड आउटलेट्स नई-नई पहल कर रहे हैं। चाय के लिए अपना कप खुद लाएं फूड आउटलेट चाय पॉइंट ने ‘ब्रिंग यॉर ओन कप’ पहल शुरू की है। इसके तहत वह अपने कस्टमर्स से अपना कप लाने की गुजारिश करता है। जो कस्टमर्स अपना कप खुद लाते हैं, उन्हें डिस्काउंट भी दिया जाता है। इसके अलावा इस फूड पॉइंट ने चाय डिलिवरी के लिए चाय फ्लास्क भी डिजाइन किए हैं। साथ ही कटलरी भी यहां बायॉडिग्रेडेबल इस्तेमाल होती है। सिटी वेस्टैंड तो अपने मॉकटेल के साथ मेटल स्ट्रॉ सर्व कर रहा है। इसके मैनेजिंग डायरेक्टर राजेश गुल्लर बताते हैं कि वह अपने कुछ मॉकटेल को सर्व करने के लिए मेटल स्ट्रॉ का इस्तेमाल करने लगे हैं और इसे आगे बढ़ाने का प्लान है। जानकारी के अनुसार, मैकडॉनल्ड्स में भी अब सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल कम किया जा रहा है, तो वहीं सीसीडी में भी अब कई चीजें गैर प्लास्टिक इस्तेमाल होने लगी हैं। आईटीओ स्थित उडुपी कैफे में भी अब पेपर स्ट्रॉ का इस्तेमाल किया जा रहा है। ग्रेटर कैलाश स्थित नट ऐंड बाउल्स कैफे ने इन दिनों अपने यहां ‘नो यूज़ ऑफ प्लास्टिक’ का नियम बनाया है। इस रेस्ट्रॉन्ट की फाउंडर सुरुचि जोशी कहती हैं, ‘हमारा कैफे वीगन वैल्यूज पर काम करता है। हम अपने रोजमर्रा के काम में बायोडिग्रेडेबल चीजों का इस्तेमाल कर रहे हैं जैसे कि बम्बू स्ट्रॉ, शीशे के जार और पेपर पाउच। हम कोई भी खाना सर्व करने के लिए प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं करते हैं।’ एनसीआर स्थित रेस्ट्रॉन्ट कूल्चाज़ भी ट्रेडिशनल गिलास और पेपर गिलास का इस्तेमाल करता है। यहां के स्टाफ को भी दोबारा इस्तेमाल की जा सकने वाले मग, कटलरी, बैग, कॉफी फिल्टर का इस्तेमाल करने का निर्देश दिया गया है। ही नहीं, बल्कि पूरे देश में होटल और रेस्ट्रॉन्ट इंडस्ट्री के बिजनस से जुड़े लोग प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करने की कोशिशों में हैं। करनाल स्थित होटल नूर महल एंड ज्वेल ग्रुप के एमडी रूप प्रताप चौधरी बताते हैं, ‘हम अपने टॉयलेटरीज में प्लास्टिक फ्री और इकोफ्रेंडली चीजों को रखते हैं, मसलन बम्बू टूथब्रश, पेपर पैक ऑर्गेनिक साबुन, पेपर कप जूट बैग्स वगैरह। हम अपने यहां प्लास्टिक के स्ट्रॉ भी नहीं इस्तेमाल कर रहे हैं बल्कि बम्बू के स्ट्रॉ कर रहे हैं। यह पेपर और जूट के बैग स्थानीय ग्रामीण लोगों से बनवाए जाते हैं। हांडी में डिलिवरी, कुम्हार को रोजगार फूड डिलिवरी की पैकेजिंग के दौरान कई बार प्लास्टिक का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन कई फूड डिलिवरी कंपनियां अब इससे हाथ पीछें खींचने लगी हैं। दिल्ली और मुंबई में फूड डिलिवरी करने वाली कंपनी बिरयानी बाइ किलो प्लास्टिक की पैकेजिंग के बजाय हांडी में अपना फूड डिलिवर करती है। इसके सीईओ कौशिक रॉय बताते हैं, ‘हम जिस हांडी में अपने खाने की डिलिवरी करते हैं, उसे दिल्ली और आसपास के इलाके के कुम्हार बनाते हैं। इससे कुम्हार और कलाकारों को रोजगार भी मिलता है। यह हांडी पूरी तरह इकोफ्रेंडली और दोबारा इस्तेमाल करने लायक होती है।’ लगभग 15 शहरों में फूड डिलिवरी करने वाली चारकोल ईट्स फूड डिलिवरी के दौरान बायोडिग्रेडेबल गार्बेज बैग का इस्तेमाल कर रही है। चावल और करी जैसे फूड आइटम्स के लिए इन्होंने हाल ही में कस्टमाइज्ड सस्टेनेबल पैकेजिंग शुरू की है। कंपनी के सीईओ अनुराग मेहरोत्रा के मुताबिक, अगले 6 महीने में हम बिजनस से 90% तक प्लास्टिक को खत्म करने का प्लान बना रहे हैं। लागत पर पड़ता है भारी असर प्लास्टिक न सिर्फ आसानी से उपलब्ध होता है, बल्कि सस्ता भी बेहद होता है। ऐसे में अगर होटल और रेस्ट्रॉन्ट्स प्लास्टिक का इस्तेमाल कम कर रहे हैं, तो क्या इसका असर उनकी लागत पर नहीं पड़ रहा है? इसके जवाब में सुरुचि जोशी कहती हैं, ‘सिंगल यूज प्लास्टिक के जिन विकल्पों का इस्तेमाल किया जाता है, उससे लागत तो बढ़ जाती है, लेकिन हमें पर्यावरण के लिए यह मंजूर है।’ बकौल सुरुचि, कस्टमर्स इस इनशिएटिव से बहुत खुश हैं। इससे उन्हें भी प्लास्टिक का इस्तेमाल न करने की सीख मिलती है। तो इस बढ़ी हुई लागत का भार किस पर पड़ रहा है? जवाब में चारकोल ईट्स के सीईओ अनुराग मेहरोत्रा कहते हैं, ‘इसकी वजह से लागत में काफी इजाफा तो हो रहा है क्योंकि कई चीजें अभी मार्केट में मौजूद नहीं हैं। लेकिन पर्यावरण और कस्टमर की भलाई के लिए फिलहाल कंपनी ही अभी इसे उठा रही है।’
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