लोकतन्त्र में जब ‘शोर-शराबा’ सिर्फ ‘कोलाहल’ बनकर राजनीति की कमान संभालने लगता है तो लोगों काे ‘राजनीति’ से ही वितृष्णा होने लगती है और ‘लोकतन्त्र’ तब लोगों की शक्ति की बजाय ‘तन्त्र’ की शक्ति पर निर्भर हो जाता है जो सर्वप्रथम सत्ता की ताकत को ही लोगों पर गालिब करके उन्हें मूकदर्शक बना देती है। ऐसा हमारे सामने-सामने ही पड़ौसी देश पाकिस्तान में हुआ था जहां 1956 में ही लोकतन्त्र को समाप्त करके पूरे राजनैतिक जगत को चोर और लुटेरा साबित करने की मुहिम शुरू हुई और बड़े इत्मीनान से वहां फौज ने हुकूमत पर काबिज होकर सबसे पहला काम संवैधानिक रूप से ‘इस्लामी मुल्क’ घोषित करने का किया। इसकी वजह यही थी कि किसी भी साम्प्रदायिक हुकूमत में लोकतन्त्र किसी भी रूप में जीवित नहीं रह सकता। इसलिए आज भी पाकिस्तान का लोकतन्त्र केवल दिखावे का लोकतन्त्र है और वहां की सत्ता की असली ‘नामानिगार’ फौज ही है।
इसलिए भारत का पूर्ण रूपेण हृदय से धर्मनिरपेक्ष होना इसमें लोकतन्त्र के जीवित रहने की पहली मूल शर्त है जिसे संविधान निर्माता बाबा साहेब अम्बेडकर ने इतनी शिद्दत के साथ महसूस किया था कि उन्होंने उस कथित हिन्दू संस्कृति को ही अमानवीय श्रेणी में डाल दिया था जिसमें दलितों को अस्पृश्य बताकर उनके साथ सदियों से जानवरों से भी बदतर व्यवहार करने की शास्त्रीय व्यवस्था थी। लोकसभा के मौजूदा चुनाव में मुद्दों को जिस तरह भटका कर कभी फौज की शौर्यगाथाओं और कभी आतंकवाद को हिन्दू-मुसलमान रंग से जोड़ने की कोशिश की जा रही है उससे भारत में वे विघटनकारी शक्तियां ही ताकत ले रही हैं जिनका लक्ष्य इसे भीतर से कमजोर बनाकर सत्ता की बागडोर चन्द धनाढ्य परिवारों के हाथ में देने का है क्योंकि इसी रास्ते से वे लोकतान्त्रिक राजनीति में पक्ष और विपक्ष के पीछे खड़ी लोगों की ताकत को नकार सकते हैं।
ठीक यही रास्ता अंग्रेजों ने भारत को अपना गुलाम बनाने के लिए अपनाया था जब उन्होंने देशी रजवाड़ों को अपनी ही रियाया पर जुल्म करने वाला साबित करके राजस्व वसूली के अधिकार अपने हाथ में लिये थे और हर रियासत में ‘रेजीडेंट बहादुर’ को बैठा दिया था। अतः यह बेसबब नहीं है कि एक-एक करके आज देश की सभी महत्वपूर्ण सरकारी कम्पनियां दिवालिया बन रही हैं और उनके द्वारा खड़े किये गये आधारभूत ढांचे को निजी क्षेत्र की कम्पनियों को तोहफे में दिया जा रहा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण टेलीकाम की महारथी कम्पनी बीएसएनएल और रक्षा उत्पादन क्षेत्र की हिन्दुस्तान एयरोनाटिक्स लि. हैं। अतः ये चुनाव कोई साधारण चुनाव नहीं हैं बल्कि भारत की युवा पीढ़ी का भाग्य तय करने वाले चुनाव हैं।
यही वजह है कि आज के राजनीतिक विमर्श में हर महत्वपूर्ण राजनैतिक दल के नेता को बेइमान और चोर साबित करने की होड़ लगी हुई है मगर इस ‘कोलाहल’ में सबसे बड़ा खतरा उन ताकतों से है जो अदृश्य रहकर भारतीय राजनीति की कमान अपने हाथ में लेना चाहती हैं और इस देश की सम्पदा पर अपना कब्जा करना चाहती हैं परन्तु यह कार्य एक झटके में नहीं किया जा सकता। इसकी एक प्रक्रिया होती है और इसके तहत सबसे पहले जनता के बीच से उठे उन नेताओं को दागदार दिखाया जाता है जिन्हें वास्तविक लोकशक्ति का प्रतीक माना जाता है। बेशक लालू प्रसाद से लेकर सुश्री मायावती, सुश्री ममता बनर्जी, मुलायम सिंह यादव आदि ऐसे ही नेता हैं जिनका जनाधार उनके नेता बनने की शर्त है। कांग्रेस पार्टी आज भी देश की ऐसी एकमात्र पार्टी है जिसके निशान इस देश के हर सूबे के हर हिस्से में बिखरे पड़े हैं। अब राहुल गांधी की नागरिकता पर ही सवाल खड़ा किया जा रहा है और इस तरह किया जा रहा है जिससे यह लगे कि पिछले 15 वर्षों से संसद में उनकी उपस्थिति कोई मायने ही नहीं रखती।
यही वह शोर-शराबा है जो लोकतन्त्र को ‘कोलाहल’ में बदलता है मगर एेसा करके हम चुनौती किसे दे रहे हैं? हम चुनौती अपने ही देश के संविधान को दे रहे हैं। यह कोई ऐसा मामला नहीं है जिसे कोई भी बड़े से बड़ा राजनीतिज्ञ छिपा सके क्योंकि जन्म से लेकर बड़े होने तक न जाने कितने दस्तावेज होते हैं जिनमें नागरिकता के आधार पर ही अधिकार तय होते हैं लेकिन राहुल गांधी ने जिस प्रकार राफेल लड़ाकू विमान मामले में प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ अपने अभियान में सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना की है उस पर तो उन्हें क्षमा याचना करना ही चाहिए थी। दरअसल यह दौर बदजुबानी का ऐसा दौर है जिसमें जुबां पर वह आता ही नहीं जो दिल में होता है। इसकी वजह यही है कि लोगों को किसी खेत में पैदा होने वाला खरबूजा समझ लिया गया है कि बस एक को जर्द कर दो बाकी सभी उसी रंग में ढल जायेंगे मगर बागवानी तो वहीं होती है जिसमें हर कली पर मेहरबानी की जाये और उसे फूल बनने का माहौल दिया जाये। हिन्दोस्तान तो ऐसा ही चमन है जिसकी बागवानी इसका लोकतन्त्र पिछले सत्तर साल से ही करता आ रहा है। इसलिए जरूरी है कि हम अपनी बुनियाद को कसकर पकड़े रहें।
from Punjab Kesari (पंजाब केसरी) http://bit.ly/2WiPhCL
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